बैंगन फसल की उन्नत उत्पादन तकनीक
उन्नत प्रभेद: अच्छेऊपज के लिए पूसा संकर-5, अर्का नवनीत, पूसा पर्पल लॉन्ग, पूसा संकर-6, किरण, नवकिरण, पूसा अंकुर या कोई अन्य किस्म, जो स्थानीय मौसम, ग्राहक की माँग व बाजार के अनुरूप हो, वैसे प्रभेद का ही चुनाव करना चाहिए.
प्रभेदें | संस्थान/ कम्पनी | प्रभेदों की विशेषताएँ |
पूसा संकर-5 | आई. ए. आर. आई., नई दिल्ली | फल की आकार व रंग: मध्यम लम्बाई वाले, गहरे बैंगनी तथा चमकदार फल का वजन: 90-100 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 50-55 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: छोटी पत्ती रोग, तना/फल बेधक के प्रति सहनसील ऊपज: 180-240 क्विंटल/ एकड़ |
अर्का नवनीत | आई. आई. आर. एच., बैंगलोर | फल की आकार व रंग: अंडाकार गोल, गहरे बैंगनी तथा चमकदार फल का वजन: 400-450 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 55-60 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: छोटी पत्ती रोग, तना/फल बेधक के प्रति सहनसील ऊपज: 260-300 क्विंटल/ एकड़ |
पूसा पर्पल लॉन्ग | आई. ए. आर. आई., नई दिल्ली | फल की आकार व रंग: लम्बा, हल्का बैंगनी तथा चमकदार फल का वजन: 80-90 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 50-55 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: जीवाणु रोग के प्रति सहनसील ऊपज: 100-150 क्विंटल/ एकड़ |
पूसा संकर-6 | आई. ए. आर. आई., नई दिल्ली | फल की आकार व रंग: गोल, आकर्षक बैंगनी तथा चमकदार फल का वजन: 150-200 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 55-60 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: छोटी पत्ती रोग, तना/फल बेधक के प्रति सहनसील ऊपज: 160-200 क्विंटल/ एकड़ |
किरण | नुज़िवीडू सीड्स, हैदराबाद | फल की आकार व रंग: गोल, बैंगनी चमकदार फल का वजन: 200-250 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 65-70 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: गर्मी के प्रति सहनसील ऊपज: 240-280 क्विंटल/ एकड़ |
नवकिरण | सनग्रो सीड्स प्रा. लि., नई दिल्ली | फल की आकार व रंग: गोल, आकर्षक बैंगनी फल का वजन: 250-300 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 60-65 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: रोग के प्रति सामान्य सहनसील ऊपज: 160-200 क्विंटल/ एकड़ |
पूसा अंकुर | आई. ए. आर. आई., नई दिल्ली | फल की आकार व रंग: अंडाकार गोल, आकर्षक बैंगनी चमकदार फल का वजन: 70-80 ग्रा. फल तोड़ाई: पौध लगाने के 45-50 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: रोग के प्रति सामान्य सहनसील ऊपज: 100-120 क्विंटल/ एकड़ |
बुआई का समय: मई-जून; अगस्त-सितम्बर;दिसम्बर-जनवरी
बीजदर: संकर; 70-80ग्रा. प्रति एकड़, किस्म; 150-200 ग्रा. प्रति एकड़
बीज उपचार: ट्रायकोडर्मा (5-6 ग्रा./ 50 मिली. यानि आधा कप पानी में) या कार्बेन्डाज़िम (2-3 ग्रा./ 50 मिली.) या अन्य फफूंदनाशी का घोल बना लें. आधा कप पानी में बना हुआ घोल से 1 कि.ग्रा. बीज उपचारित किया जा सकता है. यदि आपके पास मात्र 10 ग्रा. बीज है, तो आधे कप पानी में तैयार घोल से 10-15 बूंदों को बीज के ऊपर डालें और अच्छी तरह मिला लें. उसके बाद 20-25 मिनट तक छाये में सूखा लें, फिर बुआई कर दें.
रोपाई का समय: जून-जुलाई;सितम्बर-अक्टूबर; जनवरी-फरवरी
पौध उपचार: 25-30 दिनों के पौध को पौधशाला से प्रत्यारोपण के लिए निकाल लें. उसके बाद पौध के जड़ को ट्रायकोडर्मा (5-7 मिली/ ली.) या कार्बेन्डाज़िम (2-3 ग्रा./ ली.) के घोल में 15 मिनट तक डूबा कर छोड़ दें, फिर रोपाई करें. बीज या पौध उपचार में से कोई एक को ही अपनायें.
दूरी: संकर; कतार से कतार 90 सेमी. तथा पौध से पौध 75 सेमी.
किस्म; कतार से कतार 60 सेमी. तथा पौध से पौध 60 सेमी.
मिट्टी: अच्छे जल निकास वाली कार्बनिक पदार्थ युक्त बलुई-दोमट मिट्टी (pH: 6.0 – 7.5) सर्वाधिक उपयुक्त
नर्सरी की तैयारी व देखभाल:
- नर्सरी उगाने के लिए, 3 मीटर x 1 मीटर की 15 सेमी उठी हुई क्यारी बना लें. इस तरह के 12-15 क्यारियाँ में उगाई गई नर्सरी 1 एकड़ खेत के लिए प्रयाप्त है.
- गोबर खाद 25-30 कि.ग्रा., ट्रायकोडर्मा 25 ग्रा. तथा नीम केक 1 कि.ग्रा. प्रति क्यारी के हिसाब से मिला लें.
- यदि पर्याप्त नमी न हो, तो हल्की पानी का फब्बारा देकर खर-पतवार से ढक दें. अंकुरण होने के तुरंत बाद, खर-पतवार को हटा दें.
- 18-20 दिनों बाद, पौध के विकास और जरुरत को देखते हुए एन.पी.के.(19:19:19), 3-4 ग्रा. / ली. के दर से छिड़काव करें.
- नर्सरी में अंकुरण से पहले पानी डालने के लिए हजारे या कीटनाशक छिड़ने वाले मशीन का उपयोग करना अच्छा होता है.
खेत की तैयारी:
- खेत की तीन-से-चार बार जुताई कर, मिट्टी को भुर-भूरा बना लें.
- 8-10 टन प्रति एकड़ की दर से सड़ी हुई गोबर खाद डालें और उसके बाद मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं.
- खेत की अंतिम जुताई से पहले, यदि मिट्टी में फॉस्फेट को घुलनशील करने वाले बैक्टेरिया (बैसिलस मेगाटेरीयम), 1 कि.ग्रा./ एकड़ तथा ट्रायकोडर्मा, 1-1.5 कि.ग्रा./ एकड़ डाला जाये, तो पौधे तंदुरुस्त एवं रोग मुक्त होते हैं.
सिंचाई: खेत की नमी को ध्यान में रखते हुए, 10-15 दिनों में एक बार सिंचाई करें.
उर्वरक प्रबंधन: किलोग्राम/ एकड़
समय | यूरिया | डी.ए.पी. (डाई) | पोटाश | जिंक सल्फेट | बोरान |
रोपाई के समय | 15-20 | 50-60 | 30-35 | 3-4 | |
रोपाई के 20 दिन बाद | 30-35 | — | 5-8 | ||
फूल लगने के ठीक पहले | 10-15 | 15-20 | 20-25 | ||
पहली तुड़ाई के बाद | 15-20 | — | — |
खरपतवार प्रबंधन:
- पौध लगाने के पहले, घासनाशक (1 ली. पेंडीमिथिलिन को 9 ली. पानी में मिलायें, अब 10 ली. का घोल तैयार है. इसमें से 1 ली. घोल और 14 ली. पानी लें, फिर इसे 15 ली. वाले टंकी के स्प्रेयर मशीन से छिड़काव करें. इस तरह से एक एकड़ के लिए, आपको 10 बार यानी 150 ली. पानी का छिड़काव करना पड़ेगा) का छिड़काव करें. उसके बाद पौध का रोपाई कर दें.
- पौध रोपाई के ठीक 25-30 दिनों के बाद, बचे खरपतवार को निकौनी कराकर निकल दें
तोड़ाई एवं छंटाई: पौध लगाने के 7-10 सप्ताह के बीच में फल की तोड़ाई कर सकते हैं. बाजार की माँग व दूरी, आकार (गोल, अंडाकार गोल तथा लम्बा), रंग (गहरा बैंगनी, हल्का बैंगनी तथा हरा) को ध्यान में रखते हुए बैंगन के फलों की छंटाई करनी चाहिए. बैंगन को बाजार तक पहुचाने के लिए बाँस की टोकरी, कैरेट या लीनो बैग का प्रयोग करना चाहिए.
तोड़ाई के बाद का रख-रखाव: बैंगन को सामान्य तापक्रम पर, गर्मी में एक-से-दो दिनों तथा सर्दी में तीन-से-चार दिनों तक छाये में रखा जा सकता है. शीतगृह में, बैंगन को 7-10°C पर 7-10 दिनों तक भंडारण किया जा सकता है. बैंगन भंडारण के लिए 85-95 प्रतिशत आर्दता की जरुरत होती है.
उपज: संकर; 240-320 क्विंटल/ एकड़, किस्म; 100-150 क्विंटल/ एकड़
बैंगन के मुख्य कीट एवं रोग तथा उनका नियंत्रण:
- बीमारी: गलका/ गलुआ/ आद्रपतन रोग
लक्षण: यह मुख्यतः नर्सरी में लगने वाली भयंकर बीमारी है, जिसमें पौधे के जड़ के पास या बीच वाला भाग गल जाता है. जिसके कारण से पौध के ऊपरी भाग का वजन तना सहन नहीं कर पाता है, इसलिए पौधे जमीन पर गिर जाते हैं.
उपचार: ब्लायटोक्स; 2-3 ग्रा./ली. या 2.5 ग्रा./ ली. या मेटको 8-64; 2.5 ग्रा./ ली. या नेटिवो 0.5-1 ग्रा./ ली.
- बीमारी: फल सड़न/ फल गलन/ फोमोप्सिस
लक्षण: पतियों पर भूरे रंग के गोल धब्बे बनते हैं, जो बाद में अनिश्चित आकार के हो जाते हैं. फलों पर भूरे रंग का मुलायम, गीला व सिकुड़े हुए धब्बे बनते जाते हैं, जिससे फल सड़ने लगता है. रोगी पुष्प एव उसके पुष्प दंड काला होकर सिकुड़ जाता है.
उपचार: एन्ट्राकाल, 2-2.5 ग्रा./ ली. साफ़; 2.5 ग्रा./ ली. या मेटको 8-64; 2.5 ग्रा./ ली. या ब्लायटोक्स; 2-3 ग्रा./ ली.
नोट: नर्सरी लगाते समय बीज को 50ºC गर्म पानी में 30 मिनट तक रखें. फिर बीज की बुआई करें.
- बीमारी: फल छेदक/ फल बेधक/ तना छेदक/ फ्रूट बोरर
लक्षण: इस कीट का शिशु कोमल तनों, फूलों के दलपत्र एव छोटे फलों में प्रवेश कर अन्दर ही अन्दर खाता है. प्ररोह/ फुनगी मुरझाकर लटक जाते है और बाद में सूख जाते है. ग्रसित फल प्राय: टेढ़े-मेढे हो जाते हैं, जिससे फल की गुणवत्ता खराब हो जाती है. ऐसे फलों को बाज़ार में बेचना बहुत मुश्किल होता है.
उपचार: बाई-फ़ोर्स; 0.5 मिली/ ली. या लारविन; 2-2.5 ग्रा./ ली. या फेम; 0.25 मिली/ ली. या बैंजो सुपर; 0.75-1 मिली/ ली.
नोट: उपरोक्त में से कोई एक दवा पौध में फूल निकलते समय छिड़काव करें. तत्पश्चात हर 15 दिनों के अन्तराल पर 3-4 छिडकाव करे. बैंगन लगाते समय, हर 4-5 पंक्ति के बाद एक पंक्ति गेंदा का फूल अवश्य लगायें. इस कीट को प्रति एकड़ 4-5 फेरोमोन ट्रैप/ जाल लगाकर भी नियंत्रित कर सकते हैं. ऐसा कर फल छेदक से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.
- बीमारी: चितकबरा भृंग/ एपिलेंचना बीटल
लक्षण: वयस्क एव ग्रब दोनों ही पत्तियों के ऊपरी सतह को खाकर केवल नसों को छोड़ देते है. पत्तियाँ जालीदार हो जाती हैं, जिससे पौध का विकास रुक जाता है. यह कीट फसल को भारी नुकसान पहुँचाता है.
उपचार: टाटाफेन;1-2 मिली./ ली या लिथल सुपर 505; 1-1.5 मिली./ली या सोलोमन; 1-1.5 मिली./ली इत्यादि
- बीमारी: लाल मकड़ी/ रेड माईट
लक्षण: ये पतियों की निचली सतह पर जाला बनाकर रहते है और रस चूसते है जिससे पतियों के ऊपरी भाग में उजला धब्बा दिखाई पड़ता है, धीरे- धीरे पतियाँ पीली होकर सुख जाती है.
उपचार: ओमाईट; 1.5-2 मिली./ ली. याओबेरौन; 1मिली/ ली. या इंडोमाईट; 2-3 मिली/ ली. इत्यादि
- बीमारी: सूत्र-कृमि/ जड़ ग्रंथि रोग
लक्षण: इस बीमारी से पौधों की जड़े गाठनुमा हो जाते हैं, जिससे पौधे भूमि से पोषण नहीं ले पाते हैं. जिसके वजह से पौध का विकास रुक जाता है और वह बौने दिखने लगते हैं.
उपचार: सुमो 3 जी; 7-8 कि.ग्रा./ एकड़ या थिमेट; 10 जी 7-8 कि.ग्रा. या रीजेंट जी.आर.; 5-6 कि.ग्रा./ एकड़ की मात्रा का प्रयोग खेत के अंतिम तैयारी के समय करें.
नोट: सूत्र-कृमि प्रभावित खेतों में, फ़सल के साथ गेंदा का फूल लगा दें. फ़सल कट जाने के बाद खेत की 1-2 जुताई कर दें और धूप लगने दें. ऐसा करने से गेंदा के पौध के जड़ का रसायन सक्रीय हो जाता है, जो सूत्र-कृमि को मार देता है. वैसे खेत जिसमें सूत्र-कृमि का प्रकोप ज्यादा होता हो, उसमें रासायनिक ऊर्वरक का प्रयोग कम करें. ज्यादा-से-ज्यादा गोबर/ जैविक खाद का उपयोग करें तथा यूरिया (नाईट्रोजन) का प्रयोग घोल के रूप में करें क्योंकि मिट्टी में यूरिया के उपयोग से सूत्र-कृमि का विकास ज्यादा होता है.
- बीमारी: एफिड/ माहू
लक्षण: यहहल्के पीला रंग का, मुलायम शारीरवाला, बहुत ही छोटा कीट होता है. इसके पिछले हिस्से पर दो छोटे-छोटे डंक जैसा निकला रहता है. ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं, जिसके कारण से पत्तियाँ पीली होकर सिकुड़ती है फिर सूख जाती है. एफिड अपने ग्रंथियों से चीनी जैसा मीठा रस निकलते हैं, जिससे फफूँद रोग को बढ़ावा देता है.
उपचार: कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या जम्प; 0.2 ग्रा./ ली. या रोगारिन; 1-1.5 मिली/ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली. इत्यादि
नोट: खेतों पीले रंग का लसलसा जाल (स्टीकी ट्रैप), 10 ट्रैप/ एकड़, लगाना लाभप्रद होता है.
- बीमारी: बनरी/ छोटी पत्ती रोग
लक्षण: पतियाँ का आकार सामान्य से छोटे हो जाने के वजह से गुच्छेदार दिखती है. पौधों की पोरियाँ भी छोटी हो जाती है तथा पौधे बौने रह जाते हैं. बैंगन का फलन भी कम या नहीं होता है. यह मायकोप्लाज्मा जनित रोग है, जो फुदका कीट से फैलता है.
उपचार: शार्प; 1-2मिली/ ली. या सोलेमन के साथ ओबेरौन; 1+1 मिली./ ली या उलला; 0.25 ग्रा./ ली. इत्यादि
नोट: रोगी पौधों को उखाड़ कर जला दें या गड्ढा खोद कर दबा दें. पुराने बीज का उपयोग नहीं करें.
- बीमारी: सफेद मक्खी/ व्हाइट फ्लाई
लक्षण: निम्फ और वयस्क दोनों ही पत्तियों के निचली सतह से रस चूसते हैं. प्रभावित पत्तियाँ पीली होकर नीचे की तरफ धँस जाती है और अंततः सूख कर गीर जाती है. कभी-कभी पत्तियाँ काली भी हो जाती है.
उपचार: ओबेरौन; 1मिली/ ली. या कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या मार्कर; 2 मिली./ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली.
- बीमारी: रखिया कीट/ ऐस-वीविल
लक्षण: ये राख के रंग का होते हैं. बड़े कीट बैंगन के पत्तियों के किनारों को खाते हैं. खाये हुए पत्तों पर “U” आकार का निशान बन जाते हैं. इनके ग्रब्स पौध के जड़ को खाते हैं.
उपचार: टाईटन; 0.5-0.8 मिली./ली. या नुवान; 0.5-0.8 मिली./ली. या कोरंडा; 0.5-1 मिली./ली या टाटाफेन;1-2 मिली./ ली
- बीमारी: पर्ण दाग/ पर्ण धब्बा/ पत्ती धब्बा
लक्षण: बैंगन की पत्तियों पर कोणीय व अनियमित आकार का धब्बे बन जाते हैं. धब्बे हल्के भूरे रंग होते हैं और बाद में उसके चारों तरफ पीला रंग का पत्ता हो जाता है.
उपचार: एन्ट्राकाल, 2-2.5 ग्रा./ ली या ब्लायटोक्स; 2-3 ग्रा./ली. या 2.5 ग्रा./ ली. या मेटको 8-64; 2.5 ग्रा./ ली. इत्यादि
बैंगन के फ़सल पर रोगनिरोधी/ रोग निवारक छिड़काव: नीचेतालिका में बताये गये समय तथा क्रांतिक अवस्थाओं पर सूक्ष्म-पोषक, दवा, पौध टॉनिक इत्यादि का छिड़काव कर बैंगन की खेती में आने वाले लागत खर्च को कम किया जा सकता है. रोगनिरोधी/ रोग निवारक छिड़काव कर, फसल को लम्बे समय तक फलदार तथा निरोग रखा जा सकता है.
छिड़काव का समय | उद्देश्य | सूक्ष्म-पोषक/ दवा/ पौध टॉनिक |
रोपाई के 8-10 दिनों बाद | रोग वाहक कीटों पर नियंत्रण | कॉन्फीडोर; 0.75-1 मिली/ ली. या टाटाफेन; 1-2 मिली/ ली. या अन्य |
रोपाई के 25-30 दिनों बाद | जड़ सड़न से बचाने के लिए | कॉनटाफ प्लस; 1-1.5 मिली. + साफ; 2-2.5 ग्रा./ ली. या अन्य |
फूल निकलने की अवस्था में | पुष्प धारण क्षमता बढ़ाने में | मिराकुलान; 1-1.5 मिली. + बोरान 35 मिली ग्रा./ ली. या अन्य |
रोपाई के 40 दिन बाद (2-3 बार, 10 दिनों के अंतराल पर) | फ़सल के प्रतिरोधक क्षमता और आतंरिक ताकत के लिए | जिंक सल्फेट; 5-6 ग्रा./ ली. |
पहली तोड़ाई के बाद (3-4 बार, 15 दिनों के अंतराल पर) | बार-बार तोड़ाई से पौध में उर्जा की कमी को पूरा करने के लिए | एन.पी.के.(19:19:19); 5-7 ग्रा./ ली. |
रोपाई के 25-30 दिनों बाद | किकुड़ी/ पर्ण कुंचन पर नियंत्रण | कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या एक्ट्रा; 2 ग्रा./ ली. या जम्प; 0.2 ग्रा./ ली. या सोलेमन; 1-1.5 मिली/ ली. या अन्य |
फल लगाने के 5-10 दिनों बाद | फफूँद रोग से बचाव के लिए | अंट्राकोल; 2.5 ग्रा./ ली. या बून; 0.5 ग्रा./ ली. या साफ़; 2.5 ग्रा./ ली. |
फल लगने के 15-20 दिनों बाद | लाल मकड़ी से रोक-थाम के लिए | ओमाईट; 1-2 मिली/ ली. या ओबरौन; 1-2 मिली/ ली. या इंडोमाईट; 2-3 मिली/ ली. या अन्य |
नोट:एक एकड़ के छिड़काव के लिए, 150-200 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है.