भिन्डी फसल की उन्नत उत्पादन तकनीक

उन्नत प्रभेद: अच्छेऊपज के लिए पूसा मखमली, अर्का अनामिका, अवन्तिका गोल्ड, सुपर ग्रीन, जे.के.-7315, सम्राट या कोई अन्य किस्म, जो स्थानीय मौसम, ग्राहक की माँग व बाजार के अनुरूप हो, वैसे प्रभेद का ही चुनाव करना चाहिए.

प्रभेदेंसंस्थान/ कम्पनीप्रभेदों की विशेषताएँ
पूसा मखमलीआई. ए. आर. आई., नई दिल्लीफल की लम्बाई व रंग: 15-16 सेमी., हल्का हरा फल तोड़ाई: बुआई के 35-40 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: सामान्य ऊपज: 65-70 क्विंटल/ एकड़
अवन्तिका गोल्डश्रीराम बायो सीड्स, हैदराबादफल की लम्बाई व रंग: 12-15 सेमी., आकर्षक हरा फल तोड़ाई: बुआई के 45-50 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: पीला शिरा मोजैक वायरस के प्रति सहनशील ऊपज: 80-100 क्विंटल/ एकड़
अर्का अनामिकानामधारी सीड्स प्रा. लि., बैंगलोरफल की लम्बाई व रंग:10-12 सेमी., हरा रसीला फल तोड़ाई: बुआई के 35-40 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: पीला शिरा मोजैक वायरस के प्रति सहनशील ऊपज: 70-80 क्विंटल/ एकड़
सुपर ग्रीनवी. एन. आर. सीड्स, रायपुरफल की लम्बाई व रंग: 12-15 सेमी., गहरा हरा फल तोड़ाई: बुआई के 50-60 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: सामान्य ऊपज: 75-85 क्विंटल/ एकड़
जे.के.-7315जे. के. एग्री जेनेटिक्स, हैदराबादफल की लम्बाई व रंग: 10-12 सेमी., आकर्षक हरा फल तोड़ाई: बुआई के 40-45 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: पीला शिरा मोजैक वायरस के प्रति सहनशील ऊपज: 80-90 क्विंटल/ एकड़
सम्राट          नुन्हेम्स इंडिया प्रा. लि., गुडगाँवफल की लम्बाई व रंग: 12-14 सेमी., हरा चमकदार फल तोड़ाई: बुआई के 35-40 दिनों बाद से रोग प्रतिरोधक क्षमता: पीला शिरा मोजैक वायरस के प्रति सहनशील ऊपज: 80-90 क्विंटल/ एकड़

            बुआई का समय: खरीफ (जून-अगस्त); रबी (सितम्बर-नवम्बर); गरमा (जनवरी-मार्च)

            बीजदर: खरीफ; 6-7 कि.ग्रा./ एकड; गरमा/ रबी; 10-12 कि.ग्रा./ एकड

बीज उपचार: भिन्डी के बीज को 24 घंटे तक पानी में भिंगोयें, उसके बाद पानी से छान लें. फिर ट्रायकोडर्मा (5-6 ग्रा./ 50 मिली. यानि आधा कप पानी में) या कार्बेन्डाज़िम (2-3 ग्रा./ 50 मिली.) या अन्य फफूंदनाशी का घोल बना लें. अब तैयार घोल को 1 कि.ग्रा. बीज के ऊपर डालकर, अच्छी तरह से मिला दें. उसके बाद 1 घंटे तक छाये में सूखा लें, फिर बुआई कर दें.

दूरी: खरीफ- कतार से कतार 45 सेमी. तथा पौध से पौध 20-30 सेमी.

            गरमा- कतार से कतार 25 सेमी. तथा पौध से पौध 12 सेमी.       

      मिट्टी: अच्छे जल निकास वाली बलुई-दोमट मिट्टी (pH: 6.0 – 6-8) फ़सल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त  

खेत की तैयारी:

  • खेत की अच्छी तरह से 3-से-4 बार जुताई कर, मिट्टी को भुर-भूरी बना लें.
  • 8-10 टन प्रति एकड़ की दर से सड़ी हुई गोबर खाद डालें और उसके बाद मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं.
  • खेत की अंतिम जुताई से पहले, यदि मिट्टी में फॉस्फेट को घुलनशील करने वाले बैक्टेरिया (बैसिलस मेगाटेरीयम), 1 कि.ग्रा./ एकड़ तथा ट्रायकोडर्मा, 1-1.5 कि.ग्रा./ एकड़ डाला जाये, तो पौधे तंदुरुस्त एवं रोग मुक्त होते हैं. 

सिंचाई: खेत की नमी को ध्यान में रखते हुए, गर्मी में 6-8 दिनों बाद तथा बरसात में 12-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें.

उर्वरक प्रबंधन: किलोग्राम/ एकड़

समययूरियाडी.ए.पी.पोटाशजिंक सल्फेट
बुआई के समय10-1530-3530-35
बुआई के 25-30 दिन बाद (पहली बार)25-305-8
बुआई के 50-60 दिन बाद (दूसरी बार)25-3015-20

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खरपतवार व्यवस्थापन:

  • औक्सीफ्लोरफेन (75 ग्रा./ एकड़) को बुआई के तीसरे दिन (घास निकलने से पहले) खेत में छिड़काव करें.
  • पौधा लगाने के ठीक 25-30 दिनों के बाद, बचे हुए खरपतवार को हाथ से निकल दें.

तोड़ाई एवं छंटाई: बुआई के35-से-55 दिनों के पश्चात भिन्डी के फल का तोड़ाई किया जा सकता है. लगभग 10  सेंमी. लम्बी की भिन्डी का फल तुड़ाई हेतु ठीक पाई जाती है. यदि भिन्डी के फल का अगला हिस्सा आसानी से टूट जाए, तो समझें तोड़ाई का सही अवस्था है. भिन्डी के फल की तोड़ाई 1-2 के अन्तराल पर जरुर करा लें, ऐसा नहीं करने से फल रेशेदार हो जाते हैं. फलों की तोड़ाई सुबह में करना बेहतर होता है. बाजार की माँग व दूरी, फल की लम्बाई को ध्यान में रखते हुए भिन्डी के फलों की छंटाई करनी चाहिए. रेशेदार, उजले, पीले तथा टेढ़े-मेढ़े फलों का छंटाई कर दें. भिन्डी के फलों को बाजार तक पहुचाने के लिए बाँस की टोकरी, कैरेट या लीनो बैग का प्रयोग करना चाहिए.

तोड़ाई के बाद का रख-रखाव: शीतगृह में, भिन्डी को 7-10°C पर 8-10 दिनों तक भंडारण किया जा सकता है. भिन्डी भंडारण के लिए 95 प्रतिशत आर्दता की जरुरत होती है. ये 7°C से कम और 10°C से ज्यादा तापमान होने पर पीला होने लगता है.

उपज: संकर; 80-90 क्विंटल/ एकड़, किस्म; 50-60 क्विंटल/ एकड़

भिड़ी के मुख्य रोग एवं कीट तथा उनका नियंत्रण:

  1. बीमारी: सफेद मक्खी/ व्हाइट फ्लाई

लक्षण: निम्फ और वयस्क दोनों ही पत्तियों के निचली सतह से रस चूसते हैं. प्रभावित पत्तियाँ पीली होकर नीचे की तरफ धँस जाती है और अंततः सूख कर गीर जाती है. कभी-कभी पत्तियाँ काली भी हो जाती है.

उपचार: ओबेरौन; 1मिली/ ली. या कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या मार्कर; 2 मिली./ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली. या अन्य

  • बीमारी: रखिया कीट/ ऐस-वीविल

लक्षण: ये राख के रंग का होते हैं. बड़े कीट भिन्डी के पत्तियों के किनारों को खाते हैं. खाये हुए पत्तों पर “U” आकार का निशान बन जाते हैं. इनके ग्रब्स पौध के जड़ को खाते हैं.

उपचार: टाईटन; 0.5-0.8 मिली./ली. या टाटाफेन;1-2 मिली./ या नुवान; 0.5-0.8 मिली./ली. या कोरंडा; 0.5-1 मिली./ली

  • बीमारी: चूर्णिल आसिता/ भभूतिया रोग/ पाउडरी मिल्डेव

लक्षण: यह फफूँद से होने वाला रोग है, जिसमें पतियों पर सफ़ेद धब्बे बन जाते हैं और बाद में पतियाँ सुख जाती है.

उपचार: अमिस्टर; 0.8-1.0 मिली./ ली. या अंट्राकोल; 2.5 ग्रा./ ली. या बून; 0.5 ग्रा./ ली. या साफ़; 2.5 ग्रा./ ली.

  • बीमारी: सूत्र-कृमि/ जड़ ग्रंथि रोग

लक्षण: इस बीमारी से पौधों की जड़े गाठनुमा हो जाते हैं, जिससे पौधे भूमि से पोषण नहीं ले पाते हैं. जिसके वजह से पौध का विकास रुक जाता है और वह बौने दिखने लगते हैं.

उपचार: सुमो 3 जी; 7-8 कि.ग्रा./ एकड़ या थिमेट; 10 जी 7-8 कि.ग्रा. या रीजेंट जी.आर.; 5-6 कि.ग्रा./ एकड़ की मात्रा का प्रयोग खेत के अंतिम तैयारी के समय करें.

नोट: सूत्र-कृमि प्रभावित खेतों में, फ़सल के साथ गेंदा का फूल लगा दें. फ़सल कट जाने के बाद खेत की 1-2 जुताई कर दें और धूप लगने दें. ऐसा करने से गेंदा के पौध के जड़ का रसायन सक्रीय हो जाता है, जो सूत्र-कृमि को मार देता है. वैसे खेत जिसमें सूत्र-कृमि का प्रकोप ज्यादा होता हो, उसमें रासायनिक ऊर्वरक का प्रयोग कम करें. ज्यादा-से-ज्यादा गोबर/ जैविक खाद का उपयोग करें तथा यूरिया (नाईट्रोजन) का प्रयोग घोल के रूप में करें क्योंकि मिट्टी में यूरिया के उपयोग से सूत्र-कृमि का विकास ज्यादा होता है.

  • बीमारी: एफिड/ माहू

लक्षण: यहहल्के पीला रंग का, मुलायम शारीरवाला, बहुत ही छोटा कीट होता है. इसके पिछले हिस्से पर दो छोटे-छोटे डंक जैसा निकला रहता है. ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं, जिसके कारण से पत्तियाँ पीली होकर सिकुड़ती है फिर सूख जाती है. एफिड अपने ग्रंथियों से चीनी जैसा मीठा रस निकलते हैं, जिससे फफूँद रोग को बढ़ावा देता है.

उपचार: कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या जम्प; 0.2 ग्रा./ ली. या रोगारिन; 1-1.5 मिली/ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली.

नोट: खेतों पीले रंग का लसलसा जाल (स्टीकी ट्रैप), 10 ट्रैप/ एकड़, लगाना लाभप्रद होता है.

  • बीमारी: फल छेदक/ फल बेधक/ तना छेदक/ फ्रूट बोरर

   लक्षण: इस कीट का शिशु कोमल तनों, फूलों के दलपत्र एव छोटे फलों में प्रवेश कर अन्दर ही अन्दर खाता है. प्ररोह/ फुनगी मुरझाकर लटक जाते है और बाद में सूख जाते है. ग्रसित फल प्राय: टेढ़े-मेढे हो जाते हैं, जिससे फल की गुणवत्ता खराब हो जाती है. ऐसे फलों को बाज़ार में बेचना बहुत मुश्किल होता है.

उपचार: बाई-फ़ोर्स; 0.5 मिली/ ली. या लारविन; 2-2.5 ग्रा./ ली. या फेम; 0.25 मिली/ ली. या बैंजो सुपर; 0.75-1 मिली/ ली.

नोट: उपरोक्त में से कोई एक दवा पौध में फूल निकलते समय छिड़काव करें. तत्पश्चात हर 15 दिनों के अन्तराल पर 3-4 छिडकाव करे. बैंगन लगाते समय, हर 4-5 पंक्ति के बाद एक पंक्ति गेंदा का फूल अवश्य लगायें. इस कीट को प्रति एकड़ 4-5 फेरोमोन  ट्रैप/ जाल लगाकर भी नियंत्रित कर सकते हैं. ऐसा कर फल छेदक से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.

  • बीमारी: येलो मोजैक वायरस/ पीलिया रोग

लक्षण: यह वाइरस जनित रोग है. इसमें पत्तियों की शिरायें पीली होकर मोटी हो जाती है तथा फल पीले होने लगते है. इस वाइरस को सफ़ेद मक्खी द्वारा फैलाया जाता है, अत: सफ़ेद मक्खी को नियंत्रित कर इस रोग को कम किया जा सकता है.

उपचार: ओबेरौन; 1मिली/ ली. या कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या मार्कर; 2 मिली./ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली.

  • बीमारी: मकड़ी/ माईट

लक्षण: ये कीड़े पत्तियों का रस चूसते है तथा जाल बनाकर एक दूसरे को आपस में सटा देते हैं, जिससे पत्तियाँ मुड़कर जाती है. रोग के उग्र अवस्था में पत्ते धीरे-धीरे पीले पड़ जाते हैं, जिससे फलन कम हो जाता है.  

उपचार:. ओमाईट; 1.5-2 मिली./ली. याओबेरौन; 1मिली/ ली. या इंडोमाईट; 2-3 मिली/ ली. इत्यादि

भिन्डी के फ़सल पर रोगनिरोधी/ रोग निवारक छिड़काव: नीचेतालिका में बताये गये समय तथा क्रांतिक अवस्थाओं पर सूक्ष्म-पोषक, दवा, पौध टॉनिक इत्यादि का छिड़काव कर भिन्डी की खेती में आने वाले लागत खर्च को कम किया जा सकता है. रोगनिरोधी/ रोग निवारक छिड़काव कर, फसल को लम्बे समय तक फलदार तथा निरोग रखा जा सकता है.

छिड़काव का समयउद्देश्यसूक्ष्म-पोषक/ दवा/ पौध टॉनिक
रोपाई के 10-12 दिनों बादरोग वाहक कीटों पर नियंत्रणकॉन्फीडोर; 0.75-1 मिली/ ली. या विक्टर; 0.75-1 मिली/ ली. या जम्प; 0.2 ग्रा./ ली.
फूल निकलने की अवस्था मेंपुष्प धारण क्षमता बढ़ाने मेंमिराकुलान; 1-1.5 मिली. + बोरान 35 मिली ग्रा./ ली. या अन्य
पहली तोड़ाई के बाद (3-4 बार, 12-15 दिनों के अंतराल पर)बार-बार तोड़ाई से पौध में उर्जा की कमी को पूरा करने के लिएएन.पी.के.(19:19:19); 5-7 ग्रा./ ली.
रोपाई के 30-35 दिनों बादरस-चुसक कीट पर नियंत्रण के लिएओबेरौन; 1मिली/ ली. या कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या मार्कर; 2 मिली./ ली. या अन्य
फल लगाने के 10-15 दिनों बादफफूँद रोग से बचाव के लिएअंट्राकोल; 2.5 ग्रा./ ली. या बून; 0.5 ग्रा./ ली. या साफ़; 2.5 ग्रा./ ली.
फल लगने के 20-25 दिनों बादलाल मकड़ी से रोक-थाम के लिएओमाईट; 1-2 मिली/ ली. या ओबरन; 1-2 मिली/ ली. या इंडोमाईट; 2-3 मिली/ ली. या अन्य

नोट:एक एकड़ के छिड़काव के लिए, 150-200 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है.

भिन्डी के उत्पादन में आने वाले खर्च (बीज, उर्वरक और फ़सल सुरक्षा) का लेखा-जोखा:

ब्यौरामात्रा/एकड़लागत/ छिड़कावछिड़काव की संख्याअनुमानित लागत
बीज6-12 कि.ग्रा.2400-4500
     उर्वरकयूरिया60-75 कि.ग्रा.700-900
डी.ए.पी. (डाई)50-60 कि.ग्रा.1380-1680
एम.ओ.पी. (पोटाश)30-35 कि.ग्रा.520-630
  सूक्ष्म-पोषक  जिंक5-8 कि.ग्रा.300-480
बोरान0.5-1 कि.ग्रा.70-80
पौध-टॉनिक150-300 मिली.250-3001-2500-600
फफूँदनाशी300-450 ग्रा.150-4502-3450-900
कीटनाशक50-300 मिली.250-8503-41000-2550
घासनाशी0.5-1.0 ली.450-7501-2450-1500
 कुल लागत7470-13340/-

नोट: कुल लागत के न्यूनतम तथा अधिकतम मूल्य में ज्यादा का अंतर का वजह मशहुर कम्पनियों के बीज व रसायन के उपयोग से आ सकता है.