मक्का फसल की उन्नत उत्पादन तकनीक

उन्नत प्रभेद: अच्छेऊपज के लिए शक्तिमान-5, एन. के. 6240, पी. 3522, पी. 3544, एन. एम. एच. 713 या कोई अन्य किस्म, जो स्थानीय मौसम, ग्राहक की माँग व बाजार के अनुरूप हो, वैसे प्रभेद का ही चुनाव करना चाहिए.

प्रभेदेंसंस्थान/ कम्पनीप्रभेदों की विशेषताएँ
शक्तिमान-5आर. पी. सी. ए. यू., समस्तीपुरअवधि: 120-125 विशेषता: ज्यादा प्रोटीन मात्रा ऊपज: 8-8.5 टन/ हे.
एन. के. 6240सी. आई. प्रा. लि., हैदराबादअवधि: 120-125 विशेषता: रोग प्रतिरोधक ऊपज: 7-8 टन/ हे.
पी. 3522पी. ओ. सी., बैंगलोरअवधि: 145-150 विशेषता: रोग प्रतिरोधक ऊपज: 8.5-9 टन/ हे.
पी. 3544पी. एच. प्रा. लि., हैदराबादअवधि: 145-150 विशेषता: रोग प्रतिरोधक ऊपज: 10-10.8 टन/ हे.
एन. एम. एच. 713नुज़ीविडू सीड्स लि., हैदराबादअवधि: 115-120 विशेषता: रोग प्रतिरोधक ऊपज: 8-9 टन/ हे.

       मौसम: क्षेत्रीय प्रचालन के अनुसार

       मिट्टी: अच्छे जल निकास वाली कार्बनिक पदार्थ युक्त बलुई, दोमट मिट्टी फ़सल के लिए उपयुक्त है.

       बीजदर: 9-10 कि.ग्रा. प्रति एकड़

       बीज उपचार: फफूँदजनित रोगों को नियंत्रित करने लिए 2 ग्रा. कार्बेन्डाजिम या थिरम प्रति किलोग्राम बीज के दर से प्रयोग करें तथा कीड़ों से बचाव के लिए 1-2 मिली. इमिडाक्लोप्रीडी 600 एफ. एस. प्रति किलोग्राम बीज के दर से उपयोग करें.

खेत की तैयारी: खेत में 20-से-25 दिन पहले, 5-6 टन प्रति एकड़ की दर से सड़ी हुई गोबर खाद डालें और उसके बाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें.

  • खेत की 1 गहरी और 2 समान्य जुताई कर, मिट्टी को भुर-भूरा बना लें, उसके बाद बीज का बुआई कर दें.

बुआई की तरीका: कतार से कतार  24 इंच तथा पौधा से पौधा 8 इन्च

  • एक टीले पर एक ही बीज लगायें
  • बीज की गहराई २ इंच से ज्यादा नहीं रखें
  • उचित पौध संख्या बनाये रखने के लिए अंतर का रखना जरुरी हैं

उर्वरक प्रबंधन: किलोग्राम /एकड़

समययूरियाडी.ए.पी.पोटाशजिंक सल्फेट
बुआई के समय35-40100-11037-40 
घुटने की अवस्था35-40 8-10
पुष्प अवस्था35-4018-20 

सिंचाई: खेतों की नमी को देखते हुए, सिंचाई करें. मक्के की कुछ खास अवस्थाएं नीचे दी गईं है, जब सिंचाई करना अतिअवाश्यक होता है: (i)अंकुरण अवस्था, (ii) घुटने की ऊंचाई की अवस्था, (iii) पुष्पण की अवस्था तथा (iv) दाने भरने की अवस्था

खरपतवार नियंत्रण: एट्राजीन 500 ग्रा./एकर, बुआई के तुरंत बाद उपयोग करें तथा खेत में नमी बनाये रखें.

कटाई: फसल के पक जाने के बाद, भुट्टों को डंठल से अलग करके सुखा लें. उसके बाद थ्रेसर के द्वारा भुट्टों से दानों को अलग कर लें.

भण्डारण: दानों को बोरियों में भरकर रख दें. अनाज को नमी से दूर रखें.

ऊपज: 38-40 क्विंटल/ एकड़

मक्का के मुख्य रोग एवं कीट तथा उनका नियंत्रण:

  1. बीमारी: तना छेदक/ भुट्टा छेदक

   लक्षण: इस कीट का शिशु कोमल तनों, फूलों के दलपत्र एवं भुट्टों में प्रवेश कर अन्दर ही अन्दर खाता है. जिससे फसल की एवं गुणवत्ता पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है. यदि समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो ये पुरे फसल को बर्बाद कर देते हैं.

उपचार: बाई-फ़ोर्स; 0.5 मिली/ ली. या डेसिस; 1-1.5 मिली/ ली. या फेम; 0.25 मिली/ ली. या बैंजो सुपर; 0.75-1 मिली/ ली.

नोट: इस कीट को प्रति एकड़ 4-5 फेरोमोन ट्रैप लगाकर भी नियंत्रित कर सकते हैं. ऐसा कर हम फसलों को तना छेदक कीड़ों से होने वाले नुकसान से बचा सकते हैं.

  • कीट: एफिड/ माहू/ अन्य रस चूसक कीट

लक्षण: इस तरह के कीट आकार में बहुत ही छोटे होते हैं. ये पत्तियों के ऊपर या निचे बैठकर रस चूसते हैं, जिससे पत्तियाँ टेढ़े-मेढ़े होकर सुखाने लगती है. इस तरह के कीड़े-मकोड़े फसलों में वायरसजनित बिमारियों को बढ़ावा देते हैं.

उपचार: कॉन्फीडोर; 0.25 मिली/ ली. या जम्प; 0.2 ग्रा./ ली. या रोगारिन; 1-1.5 मिली/ ली. या उलला; 0.25 ग्रा./ ली. इत्यादि

नोट: खेतों पीले एवं नीले रंग का लसलसा जाल (स्टीकी ट्रैप), 10 ट्रैप/ एकड़, लगाना लाभप्रद होता है.

  • कीट: कटुआ/ कटवर्म

लक्षण: यहकीड़ाअंकुरण से 10-15 दिनों के अन्दर ही फसल को नुकसान पहुँचाता है. यह रात में पौध को जड़ के पास से ही काट गिराता है. सुबह जब किसान खेत में कीड़ा खोजता है, तब ये मिट्टी या घास में छुप जाते हैं. यह देखने में काला होता है, अतः इसको कजरा पिल्लू भी कहा जाता है.

उपचार: डेसिस; 1 मिली/ ली. या लीथल सुपर; 0.5-1 मिली/ ली या कोरंडा 505; 0.5-1 मिली/ ली

  • कीट: दीमक

लक्षण: यहहल्के पीला/ सफेद रंग का छोटे कीट होते है, जो अधिकतर बलुई मिट्टी वाले खेतों में पाए जाते हैं. बलुई खेतों में नमी बहुत जल्द भाग जाता है और यही वजह है कि जिस खेत में नमी हमेशा बरक़रार रहती है, उसमें दीमक नही लगते हैं. अतः खेत की हल्की सिंचाई कर, फसल में दीमक का दवा छिड़काव करें.

उपचार: लीथल सुपर505; 0.5-1 मिली/ ली या रीजेंट धूल; 3-4 कि.ग्रा./ एकड़ (खेत तैयार करते समय)

  • बीमारी: फफूंद रोग

लक्षण: मक्के के फफूँदजनित बीमारियाँ जैसे रतुआ, पर्ण-धब्बा तथा डोव्नी मिल्डेव को नियंत्रित करने के लिए फफूँदनाशी का प्रयोग करें. फफूँदजनित रोग में, फसल के पत्तियों के ऊपर काला, पीला, सफेद या लाल रंग का निशान दिखता है.

उपचार: साफ; 2-3 ग्रा./ ली. या एन्ट्राकाल; 2 ग्रा./ ली. या अमिस्टर; 0.8-1.0 मिली./ ली.

  • कीट: फाल आर्मीवर्म

लक्षण: यह कीट मक्का कोबहुत ही नुकसान पहुँचाता है. यह फसल के किसी भी अवस्था को प्रभावित कर सकता है. फाल आर्मीवर्म मिडरिब को छोड़कर पत्तियों के सभी भाग को खा जाता हैं. यदि समय रहते कीट का नियंत्रण नही किया गया, तो बाद में फसल को बचा पाना मुश्किल हो जाता है.  

उपचार: डेलीगेट; 0.5 मिली/ ली. या डेसिस; 1.5 मिली/ ली. या फेम; 0.25 मिली/ ली.

नोट: अपने नजदीकी कृषि विज्ञानं केंद्र या अन्य सरकारी संस्थाओं से सम्पर्क कर, बत्ती-जाल के बारें में पूछें. प्रति हेक्टेयर 1-2 बत्ती-  जाल लगा कर, आप अपने पौधों को कीटों से होने वाले भारी नुकसान से बचा सकते हैं.